बिहार बोर्ड कक्षा 12वीं हिन्दी के तेरहवें अध्याय 'गाँव का घर' (ज्ञानेन्द्रपति) के 26 अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ) यहाँ दिए गए हैं। यह कविता ग्रामीण जीवन के विघटन और स्मृतियों के गाँव की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
1. 'गाँव का घर' कविता का सारांश एवं भावार्थ
बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिंदी के अध्याय 13 में संकलित 'गाँव का घर' कविता हिंदी के प्रमुख आधुनिक कवि ज्ञानेन्द्रपति द्वारा रचित है। यह कविता उनके काव्य-संग्रह 'संशयात्मा' से ली गई है। यह एक स्मृतिपरक और चिंतनशील कविता है जिसमें ग्रामीण जीवन के विघटन, पंचायती व्यवस्था के पतन और शहरीकरण के प्रभाव को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है।
🏡 गाँव की टूटती आत्मा
"पंचायती राज में जैसे खो गए पंचपरमेश्वर"
इस पंक्ति में कवि ने पंचायती व्यवस्था के पतन की ओर संकेत किया है। पारंपरिक ग्रामीण न्याय व्यवस्था जहाँ पंचों को परमेश्वर के समान माना जाता था, वह व्यवस्था अब खो गई है। अब गाँव की समस्याओं का निपटारा शहर की अदालतों में होता है, जो गाँव से दूर और अपरिचित हैं।
2. ज्ञानेन्द्रपति: जीवन परिचय एवं साहित्यिक योगदान
ज्ञानेन्द्रपति (जन्म: 1950) हिंदी साहित्य के प्रमुख आधुनिक कवि हैं। उनका पूरा नाम ज्ञानेन्द्रपति चौबे है। उनका जन्म गोड्डा, झारखंड में हुआ था। उनके पिता का नाम देवेंद्र प्रसाद चौबे था। ज्ञानेन्द्रपति ने हिंदी साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है और उन्हें दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान से सम्मानित किया गया है।
📅 ज्ञानेन्द्रपति: जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ
🏛️ पंचायती राज की विफलता
1. पंचपरमेश्वर का खो जाना: पारंपरिक ग्रामीण न्याय व्यवस्था का पतन
2. शहरी अदालतों का प्रभुत्व: गाँव की समस्याओं का समाधान अब शहर की अदालतों में
3. सामुदायिकता का विघटन: गाँव की सामूहिक चेतना का खत्म होना
4. लोकतंत्र का संकट: स्थानीय स्वशासन व्यवस्था का कमजोर होना
5. सांस्कृतिक विखंडन: ग्रामीण संस्कृति का शहरी संस्कृति में विलीन होना
3. 'गाँव का घर' कविता की साहित्यिक विशेषताएँ
- रस: करुण रस प्रधान, शांत रस का सम्मिश्रण
- छंद: मुक्तछंद, स्वच्छंद प्रवाह
- भाषा: सहज, प्रवाहमयी, प्रतीकात्मक खड़ी बोली
- शैली: स्मृतिपरक, चिंतनशील, व्यंग्यात्मक
- अलंकार: प्रतीक, उपमा, रूपक का सार्थक प्रयोग
- भावपक्ष: सामाजिक चिंता, सांस्कृतिक विषाद
🎭 'गाँव का घर' में प्रतीक और बिम्ब
1. घर: गाँव की सामूहिक पहचान, स्मृतियों का संसार
2. पंचपरमेश्वर: पारंपरिक न्याय व्यवस्था, ग्रामीण नैतिकता
3. सर्कस का प्रकाश-बुलौआ: शहरी मनोरंजन, बाहरी आकर्षण
4. रीढ़ का झुरझुराना: गाँव की मूल संरचना का कमजोर होना
5. लोकगीतों की खामोशी: सांस्कृतिक विरासत का लुप्त होना
6. शहर की अदालतें: केन्द्रीकृत न्याय व्यवस्था, गाँव से दूरी
4. प्रमुख रचनाएँ
- काव्य-संग्रह: संशयात्मा, आत्महत्या के विरुद्ध, भूरी-भूरी खाक धूल
- साहित्यिक विशेषता: ग्रामीण जीवन, सामाजिक विडंबनाएँ, आधुनिक संदर्भ
- प्रसिद्ध कविताएँ: गाँव का घर, संशयात्मा, शहर में बसंत
- सम्मान: दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान
5. 'गाँव का घर' का सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह कविता सिर्फ एक व्यक्तिगत स्मृति-गीत नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है:
🌾 सांस्कृतिक एवं सामाजिक संदर्भ
1. ग्रामीण जीवन का संकट: भारतीय समाज में गाँवों का पारंपरिक महत्व और उसका वर्तमान संकट
2. शहरीकरण का प्रभाव: शहरों के बढ़ते प्रभाव से ग्रामीण संस्कृति का ह्रास
3. पंचायती राज की विफलता: स्थानीय स्वशासन व्यवस्था के कमजोर होने का दर्द
4. सांस्कृतिक विरासत का हनन: लोकगीतों, लोककथाओं, परंपराओं का लुप्त होना
5. आधुनिकता और परंपरा का संघर्ष: पुराने मूल्यों और नए विचारों के बीच टकराव
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
• पंचायती राज व्यवस्था का कमजोर होना
• शहरीकरण के प्रभाव से ग्रामीण संस्कृति का ह्रास
• सामुदायिक जीवन का विखंडन
• लोकगीतों और लोकपरंपराओं का लुप्त होना
• शहर-केंद्रित न्याय व्यवस्था का प्रभुत्व
• गाँव की स्मृतियों का धुंधलाना
• भाषा: सहज, प्रवाहमयी, प्रतीकात्मक खड़ी बोली
• शैली: स्मृतिपरक, चिंतनशील, व्यंग्यात्मक
• छंद: मुक्तछंद, स्वच्छंद प्रवाह
• अलंकार: प्रतीक, उपमा, रूपक का सार्थक प्रयोग
• भावपक्ष: सामाजिक चिंता, सांस्कृतिक विषाद
• बिम्ब योजना: ग्रामीण जीवन से लिए गए सजीव बिम्ब
• प्रतीकात्मकता: घर, पंचपरमेश्वर, सर्कस आदि का प्रतीकात्मक प्रयोग
कविता की भाषा में गाँव की सादगी और सहजता है, परंतु उसमें गहन सामाजिक चिंता और दार्शनिक गंभीरता भी है।
• साहित्यिक: हिंदी साहित्य में ग्रामीण जीवन के यथार्थ चित्रण की परंपरा को आगे बढ़ाया, मुक्तछंद कविता का उत्कृष्ट उदाहरण
• सामाजिक: ग्रामीण जीवन के विघटन और पंचायती व्यवस्था के पतन की ओर ध्यान आकर्षित किया
• सांस्कृतिक: ग्रामीण संस्कृति और लोकपरंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया
• राजनीतिक: स्थानीय स्वशासन व्यवस्था की कमियों और चुनौतियों को उजागर किया
• मानवीय: बदलते समय में मनुष्य की पहचान और जड़ों से जुड़ाव के संकट को व्यक्त किया
• ऐतिहासिक: गाँवों के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास का दस्तावेजीकरण किया
यह कविता सिर्फ एक स्मृति-गीत नहीं है, बल्कि समकालीन भारतीय गाँवों की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति का काव्यात्मक विश्लेषण है।
📚 बोर्ड परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
गाँव का घर बिहार बोर्ड 12वीं हिंदी परीक्षा में मध्यम वेटेज वाला अध्याय है। निम्न बिंदुओं पर विशेष ध्यान दें:
- कवि का परिचय: ज्ञानेन्द्रपति का जीवन परिचय, जन्मस्थान, पिता का नाम, सम्मान
- काव्य-संग्रह: 'संशयात्मा' संग्रह का नाम और विशेषताएँ
- मुख्य विषय: ग्रामीण जीवन का विघटन, पंचायती राज की विफलता
- प्रतीकात्मकता: 'पंचपरमेश्वर', 'घर', 'सर्कस' आदि के प्रतीकात्मक अर्थ
- भाषा शैली: मुक्तछंद, स्मृतिपरक शैली, व्यंग्यात्मकता
- महत्वपूर्ण पंक्तियाँ: "पंचायती राज में जैसे खो गए पंचपरमेश्वर..." आदि
- सामाजिक संदर्भ: शहरीकरण का प्रभाव, लोकगीतों का लुप्त होना
टिप: 2023 और 2024 के पेपरों में 'पंचपरमेश्वर' पंक्ति, काव्य-संग्रह का नाम और कवि के जन्मस्थान से संबंधित प्रश्न पूछे गए थे। इन्हें अवश्य याद रखें।
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