बिहार बोर्ड कक्षा 12वीं हिन्दी के दूसरे अध्याय 'सूरदास के पद' के 30 अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ) यहाँ दिए गए हैं। सूरदास भक्तिकाल के महान कवि हैं जिन्होंने बाल कृष्ण की लीलाओं का अद्भुत वर्णन किया है।
1. 'सूरदास के पद': काव्य विश्लेषण और सारांश
'सूरदास के पद' बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'दिगंत भाग-2' में संकलित दो पद हैं जो महान भक्त कवि सूरदास द्वारा रचित हैं। ये पद सूरदास के विशाल काव्य संग्रह 'सूरसागर' से लिए गए हैं। इन पदों में बाल कृष्ण की मनोहर लीलाओं का वर्णन है जिसमें वात्सल्य रस की प्रधानता है।
🦚 भक्तिकाल का स्वर्णिम युग
सूरदास (1478-1583 ई॰) भक्तिकाल की कृष्णाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि हैं। उन्हें 'वात्सल्य रस का सम्राट' कहा जाता है। उनके काव्य में बाल कृष्ण की चंचलता, माखन चोरी, यशोदा माता का स्नेह और गोपियों का प्रेम सजीव रूप में चित्रित हुआ है। सूरदास की भक्ति 'माधुर्य भाव' की है जिसमें भक्त ईश्वर को प्रियतम के रूप में देखता है।
2. सूरदास: जीवन परिचय और साहित्यिक योगदान
सूरदास (1478-1583 ई॰) का जन्म सीही, दिल्ली के निकट एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। कुछ विद्वान उनका जन्मस्थान रुनकता, आगरा भी मानते हैं। मान्यता है कि सूरदास जन्मांध थे, लेकिन उनकी काव्य दृष्टि इतनी तीव्र थी कि उन्होंने कृष्ण लीला का ऐसा सजीव चित्रण किया जैसे वे सब कुछ देख रहे हों।
👶 वात्सल्य रस की अनुपम अभिव्यक्ति
"जागिए, ब्रजराज कुँवर, कँवल-कुसुम फूले।"
सूरदास के इस पद में बाल कृष्ण को जगाने का प्रसंग है। यशोदा माता बाल कृष्ण को जगाते हुए कहती हैं कि सुबह हो गई है, कमल के फूल खिल गए हैं। लेकिन कृष्ण सोते रहते हैं। यहाँ माता के स्नेह और बालक की नटखटता का मनोहारी चित्रण है।
3. प्रमुख रचनाएँ और साहित्यिक विशेषताएँ
सूरदास की प्रमुख रचनाएँ:
- सूरसागर: सूरदास की सबसे प्रसिद्ध और विशाल रचना। मूल रूप में इसमें 1,00,000 पद होने का उल्लेख है, लेकिन वर्तमान में लगभग 5,000 पद ही उपलब्ध हैं।
- सूरसारावली: इसमें 1,107 छंद हैं जो कृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हैं।
- साहित्य लहरी: 118 पदों का संग्रह जिसमें विभिन्न भक्ति रसों की अभिव्यक्ति है।
- नल-दमयंती: महाभारत की कथा पर आधारित रचना।
- ब्याहलो: कृष्ण और रुक्मिणी के विवाह का वर्णन।
🎵 ब्रजभाषा का मधुर संगीत
सूरदास की भाषा ब्रजभाषा है जो अत्यंत मधुर, सरल और संगीतात्मक है। उनकी भाषा में लोकजीवन की सहज अभिव्यक्ति मिलती है। सूरदास ने अपने पदों को राग-रागिनियों में बाँधा है, इसलिए उनके पद गेय हैं और आज भी भजन के रूप में गाए जाते हैं। उनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ-साथ ब्रज क्षेत्र की लोकबोली के शब्दों का सुंदर सम्मिश्रण है।
4. सूरदास के काव्य की विशेषताएँ
मुख्य विशेषताएँ:
- वात्सल्य रस की प्रधानता: बाल कृष्ण और यशोदा के संबंधों का मार्मिक चित्रण
- श्रृंगार रस का वर्णन: राधा-कृष्ण के प्रेम का सूक्ष्म अंकन
- प्रकृति चित्रण: ब्रज की प्राकृतिक सुषमा का सजीव वर्णन
- संगीतात्मकता: पदों का गेय और लयबद्ध होना
- भावप्रधानता: भक्ति भावना की तीव्र अभिव्यक्ति
- लोकजीवन का चित्रण: ग्रामीण जीवन की सहज झलक
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
- यह हिंदी का पहला महाकाव्य माना जाता है
- इसमें कृष्ण चरित का पूर्ण वर्णन है
- वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ उदाहरण है
- ब्रजभाषा के विकास में इसका महत्वपूर्ण योगदान है
- यह भक्ति काव्य की पराकाष्ठा है
- प्रेममयी भक्ति: ईश्वर के प्रति प्रेम और अनुराग
- सखा भाव: कृष्ण को मित्र के रूप में देखना
- दास्य भाव: कृष्ण को स्वामी और स्वयं को दास मानना
- वात्सल्य भाव: कृष्ण को बालक के रूप में देखना
- माधुर्य भाव: कृष्ण को प्रियतम के रूप में देखना (गोपियों के प्रसंग में)
- माखन चोर: गोपियों का माखन चुराने वाला
- चंचल बालक: हर समय नई-नई शरारतें करने वाला
- स्नेह के पात्र: माता यशोदा का लाड़ला
- डरपोक: यशोदा माता की डाँट से डरने वाला
- चतुर: अपनी शरारतों के लिए बहाने बनाने वाला
- भक्तिकाल के प्रमुख स्तंभ: वे भक्तिकाल की कृष्णाश्रयी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं
- ब्रजभाषा के विकासकर्ता: उन्होंने ब्रजभाषा को साहित्यिक भाषा का दर्जा दिलाया
- वात्सल्य रस के प्रवर्तक: वात्सल्य रस को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया
- सूफी और भक्ति का समन्वय: उनके काव्य में सूफी प्रेम दर्शन और हिंदू भक्ति का सुंदर समन्वय है
- लोककला और साहित्य का संगम: उनके पद लोकगीतों और शास्त्रीय संगीत दोनों में गाए जाते हैं
- सांस्कृतिक एकता के प्रतीक: उनके काव्य ने उत्तर भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया
संपादक: प्रो. आर. के. शर्मा | अंतिम समीक्षा: जनवरी 2026 | शब्द संख्या: 2500+